धमतरी (छत्तीसगढ़) का बूटीगढ़ – प्रकृति, पौराणिक विरासत और वन-औषधीय खजाना
भाग-2
9) बूटीगढ़ की यात्रा — कैसे पहुँचे
धमतरी जिले से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिंगपुर गाँव इस पवित्र, वन-समृद्ध क्षेत्र का मुख्य द्वार है।
सिंगपुर से लगभग 5 किलोमीटर अंदर जंगल की ओर बढ़ते ही बूटीगढ़ का रहस्यमय परिसर प्रारंभ हो जाता है।
इस स्थान तक पहुँचने का प्रमुख मार्ग —
✅ धमतरी → नगरी → सिंगपुर → बूटीगढ़ (वन-मार्ग)
हालाँकि यह क्षेत्र घने जंगलों व प्राकृतिक भू-आकृति से घिरा है, परंतु इतना दुर्गम भी नहीं कि सामान्य यात्री न पहुँच सके।
यात्रा सुझाव
-
सर्दियों या वर्षा बाद का समय सबसे अनुकूल माना जाता है, जब जंगलों की हरियाली अपने चरम पर होती है।
-
दिन के समय ही यात्रा करना उचित है —
क्योंकि शाम के बाद अंधेरा व वन्यजीवों की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं। -
स्थानीय गाइड / ग्रामीण साथ ले जाना लाभकारी रहता है।
-
रास्ते में भोजन, पानी, टॉर्च, प्राथमिक दवाएँ साथ रखना आवश्यक है।
-
प्रकृति संवेदनशील है —
अतः प्लास्टिक / कचरा जंगल में न फैलाएँ।
यह यात्रा केवल एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि प्रकृति व आध्यात्मिकता का अनुभव है, जो मन-मस्तिष्क को अद्भुत शांति प्रदान करता है।
10) बूटीगढ़ — जड़ी-बूटियों का जीवंत भंडार
बूटीगढ़ का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है —
वन-औषधीय विविधता
स्थानीय जनविश्वास, पारंपरिक आयुर्वेद तथा जनजातीय उपचार-पद्धति के अनुसार
यहाँ अनेक प्रकार की बहुमूल्य औषधीय पौधियाँ पाई जाती हैं।
प्रमुख उपयोग
यहाँ की जड़ी-बूटियों से उपचार किए जाते हैं—
✔ बुखार
✔ पेट संबंधी समस्याएँ
✔ त्वचा रोग
✔ घाव-चोट
✔ अस्थि-विकृति
✔ विषैले दंश
✔ महिलाओं से संबंधित रोग
✔ मानसिक व शारीरिक दुर्बलता
यहाँ के वन-उपचारक (वैद्य) रोग की प्रकृति समझकर
प्राकृतिक जड़ी-बूटियाँ, कंद-मूल, पत्ते, रस आदि से दवाएँ बनाते हैं।
इन औषधियों का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा से चला आ रहा है।
11) रघु ठाकुर — परंपरागत वैद्य परंपरा के धारक
बूटीगढ़ के निकट रहने वाले
श्री रघु ठाकुर
एक प्रसिद्ध पारंपरिक वैद्य एवं पुजारी माने जाते हैं।
उनके पास जड़ी-बूटियों का गहन ज्ञान है
जो उन्होंने परिवार, पूर्वजों और प्रत्यक्ष अनुभवों से पाया।
विशेषताएँ
-
वे जड़ी-बूटी पहचानने में निपुण हैं
-
रोग देखकर सही औषधि चुनते हैं
-
आयुर्वेदिक-तत्वों व प्रकृति-चक्र का ज्ञान रखते हैं
-
रोगियों को सरल-सरल जीवनशैली की सलाह देते हैं
स्थानीय लोग उनके उपचार पर विश्वास रखते हैं
और दूर-दूर से लोग उनसे परामर्श लेने आते हैं।
उनकी यह विद्या जनसेवा और प्रकृति-सेवा का सुंदर संगम है।
12) बूटीगढ़ एवं संजीवनी कथा
भारतीय पुराणों में संजीवनी बूटी एक दिव्य औषधि रही है
जो मृतप्राय को भी जीवन प्रदान कर सकती है।
जब रावण से युद्ध में लक्ष्मण बेहोश हो गए थे
तब हनुमानजी हिमालय से संजीवनी लेने गए।
जनश्रुति है कि
वापसी में ले जाते समय पर्वत का एक भाग
वर्तमान धमतरी क्षेत्र में गिरा —
जिसे आज लोग बूटीगढ़ कहते हैं।
इसलिए यहाँ पाई जाने वाली
विशेष, दुर्लभ, प्रकाशमान औषधियों को
लोग संजीवनी का अंश मानते हैं।
रात्रि-प्रकाशमान जड़ी-बूटी
स्थानीय मान्यता है —
यहाँ की पहाड़ियों में ऐसी जड़ी-बूटियाँ हैं
जो अंधेरे में हल्की चमक देती हैं।
यद्यपि वैज्ञानिक अध्ययन शेष है
परंतु ग्रामीण व वैद्य इसका अनुभव बताते हैं।
यह कथा बूटीगढ़ को
पौराणिक-आध्यात्मिक प्रभा प्रदान करती है।
13) बूटीगढ़ के धार्मिक-आध्यात्मिक पक्ष
यह स्थल केवल वन-औषधि की भूमि ही नहीं
बल्कि धार्मिक आस्था का केंद्र भी है।
मुख्य मान्यताएँ
-
यह स्थान देवियों की तपोभूमि
-
माता अन्नपूर्णा का निवास-स्थल
-
वन-देवताओं का संरक्षण-क्षेत्र
वन के बीच स्थित
प्राचीन देवस्थल / मंदिर
स्थानीय लोगों की श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र है।
पूजा-अनुष्ठान
-
नित्य पूजा
-
मौसमी अनुष्ठान
-
विशेष पर्व-पूजन
इन अनुष्ठानों में
ग्रामीण गहरी भक्ति से शामिल होते हैं
और प्रकृति से आशीष प्राप्त करते हैं।
14) लोक-कथा एवं सांस्कृतिक विश्वास
बूटीगढ़ की सबसे रोचक कथा है —
देवी-भोजन पात्र की कथा
कथाओं के अनुसार —
देवियाँ इस स्थान पर रुकी थीं
और जाने के समय
एक पात्र छोड़ गईं
जिसमें प्रतिदिन भोजन मिलता था।
परंतु एक दिन
कुछ लोगों ने लालचवश अधिक भोजन ले लिया
और मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हुए।
यह कथा सिखाती है —
“प्रकृति दान करती है —
परंतु लोभ को क्षमा नहीं करती।”
ऐसी कथाएँ जनमानस को
प्रकृति के प्रति श्रद्धा, अनुशासन व विनम्रता का भाव सिखाती हैं।
15) पर्व और मेले
बूटीगढ़ में वर्ष में दो मुख्य अवसरों पर
विशेष आयोजन होते हैं —
✅ महाशिवरात्रि
✅ नवरात्रि
इन अवसरों पर
भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं
पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन
और प्रसाद वितरण होता है।
वन में
स्थानीय व्यापारी दुकानें लगाते हैं
जिससे मेला-जैसा वातावरण निर्मित होता है।
यह मेलों से
स्थानीय संस्कृति
और आजीविका
दोनों को ऊर्जा मिलती है।
16) पर्यटन — अनुभूति और आकर्षण
बूटीगढ़ केवल दर्शनीय स्थल नहीं
बल्कि अनुभूतियों का संसार है।
यहाँ आने पर
-
शांति
-
आध्यात्मिकता
-
प्रकृति-सुगंध
-
जंगल की ध्वनि
-
औषधीय सुगंध
-
स्वाभाविक सौंदर्य
—सब मानव को भीतर से स्पर्श करते हैं।
पर्यटक अक्सर बताते हैं —
यहाँ आकर मन
अद्भुत रूप से शांत व सकारात्मक हो जाता है।
17) संरक्षण — आवश्यक कदम
बूटीगढ़
वन-औषधीय
पौराणिक
आध्यात्मिक
जनजातीय
संस्कृति की
बहुमूल्य धरोहर है।
इसे संरक्षित करने के लिए —
✅ अनियंत्रित वृक्ष-कटाई रोकना
✅ जड़ी-बूटियों का संरक्षण
✅ वन्य जीवों का संरक्षण
✅ स्वच्छता बनाए रखना
✅ पर्यटन का संतुलित विकास
✅ स्थानीय परंपराओं का सम्मान
बूटीगढ़ की पहचान
प्रकृति और संस्कृति
दोनों के समन्वय में है।
अतः इसका संरक्षण
प्रशासन, समाज, जनजातियों,
और पर्यटकों —
सभी का दायित्व है।
18) भविष्य की संभावनाएँ
बूटीगढ़
वन-आधारित स्वास्थ्य पर्यटन
(eco-herbal tourism)
का केंद्र बन सकता है।
यहाँ
-
औषधीय अनुसंधान
-
वन-आधारित रोजगार
-
जनजातीय कला-संरक्षण
-
पर्यटन-विकास
के द्वार खुल सकते हैं।
यदि
प्रकृति संतुलन
और परंपरा का संरक्षण बना रहे
तो यह क्षेत्र
छत्तीसगढ़ ही नहीं
भारतीय मानचित्र पर
अनूठा स्थान प्राप्त कर सकता है।
19) निष्कर्ष
बूटीगढ़
केवल एक पर्यटन-स्थल नहीं,
बल्कि —
✔ वन-औषधि का घर
✔ पौराणिक धरोहर
✔ जनजातीय संस्कृति
✔ आध्यात्मिक ऊर्जा
✔ प्रकृति की कक्षा
—सभी का अद्भुत संगम है।
यह स्थान सिखाता है —
प्रकृति हमारी शिक्षक है,
दिव्यता हमारी परंपरा है
और सह-अस्तित्व हमारा धर्म है।
बूटीगढ़
सिर्फ जंगल नहीं —
बल्कि वह अनुभव है
जो मन को भीतर तक छूता है।
और भी देखे ः-
